आज़ादी का अमृत महोत्सव भारतवर्ष मना रहा है। आज़ादी के मतवालों की याद फिर से दिला रहा है। तो क्यों ना मैं भी अपनीकलम से लिखा कुछ आपको सुना दूँ

यह शख्स वह है जो बंदी बनाए जाने पर अपना नाम राम मोहम्मद सिंह आज़ाद बता रहा है। ((Sing like poetry))

राम मोहम्मद सिंह आज़ाद किस धर्म? किस मज़हब के थे? क्या नाम सुनकर बता सकते हैं आप? नहीं ना।

इसीलिए यह नाम उन्होंने तब चुना जब भरी सभा में माइकल डायर को उन्होंने सबके सामने निडर होकर गोलियों से भून डालाऔर उनकी हत्या कर दी। मिचेल डायर। जी हाँ।

यह वही शख्स था जिसके एक इशारे पर जनरल डायर ने 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन इतना भयानक नरसंहार किया।

मैं बात कर रहा हूँ जलियांवाला बाग़ हत्याकांड की उस घटना की जिसे स्वयं राम मोहम्मद सिंह आज़ाद यानी ऊधम सिंह नेअपनी आँखों से देखा था उस समय उनकी उम्र केवल 18 वर्ष थी।

ऊधम सिंह बचपन से ही अनाथ थे और अपने भाई के साथ अनाथालय में रहते थे। जलियांवाला बाग़ की घटना के समय वेअपने भाई और कुछ दोस्तों के साथ वहां पानी पहुंचाने का काम कर रहे थे। इस घटना ने उनको इतनी गहरी चोट पहुंचाई कीउन्होंने फैसला कर लिया कि वह इस हत्याकांड का बदला ज़रूर लेंगे। पर यह काम इतना आसान नहीं था। काफी सालों केइंतज़ार के बाद एक बार उनको कहीं से ख़बर मिली कि ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा आयोजित एक सभा में मिचेल -- डायरभाषण देने आने वाले हैं। ऊधम सिंह का मक़सद हमेशा से साफ था - बदला।

फिर क़रीब 13 मार्च 1940 को वे अंग्रेज़ो की तरह सूट बूट पहले उस सभा में पहुंच गए और अपने किताब में छुपा कर ले गएएक बंदूक। जैसे ही डायर मंच पर अपना भाषण देने के लिए आये ऊधम सिंह ने एक के बाद एक 6 गोलियां उन पर चलाईजिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। भगत सिंह को अपना हीरो मानने वाले ऊधम सिंह वहाँ से भागे नहीं बल्कि गर्व से अपनीगिरफ्तारी दे दी।

इस घटना ने एक बार फिर ब्रिटिश सरकार की जड़ें हिला दी। इस वारदात के 4 महीने बाद 31 जुलाई 1940 को ऊधम सिंह कोफांसी की सजा सुनाई गई और भारत माता का यह वीर सपूत हमेशा के लिए उनकी गोद में सो गया।

जय हिन्द